Essay on Pollution in Hindi - पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध (700 Words+)

आज के इस पोस्ट में हम आपको पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध बताने वाले है जो की आपको बेहद अच्छा लगेगा। कृपया इस पोस्ट को अपने मित्रों के साथ जरूर शेयर करें।


Essay on Pollution in Hindi - पर्यावरण प्रदूषण पर निबंध

Essay on Pollution in Hindi

मनुष्य अपने दैनिक जीवन में जिस सक्रियता का परिचय देता है उसके दो परिणाम होते (1) लक्ष्य की उपलब्धि (2) गन्दगी का परित्याग । हम चाहे मलमूत्र त्याग करें, चाहे फसल उगायें, खेलें- कूदें या घरेलू कामकाज करें, थोड़ी बहुत ऐसी चीजें छोड़ ही देते हैं जिसे गन्दगी कहते हैं। इस गन्दगी को साफ कर उच्छिष्ट पदार्थो को एक जगह रखते जाते हैं। इसे कूड़ा कहते हैं। 


हम कभी इन कूड़ों को खाद बना देते हैं, कभी जला देते हैं, कभी जमीन के नीचे गाड़ देते हैं। यदि ऐसा न करें तो कुड़ों का अम्बार लग जाय। कूड़ा या गन्दगी हमेशा हानिकर है । यह कीटाणु पैदा करता है। ये कीटाणु हमें रूग्ण बनाते हैं अतः इनकी रोकथाम आवश्यक है। जब से वैज्ञानिक प्रगति के कारण कल कारखानों में वृद्धि हुई है तबसे कारखानों से निकलने वाला धुँआ, उनमें प्रयुक्त होने वाले रसायनों तथा सामग्रियों के अवशेष, उसके धूल-कण आदि की मात्रा लगातार बढ़ती और जमा होती जा रही है। 


ये रसायन, हमारे लिए उपर्युक्त कूड़ों की ही भाँति हानिकर हैं। हम जिस संसार में रह रहे हैं उसमें हमारे जीवन के तीन आधार तत्व हैं। प्रथम धरती, जिस पर हम रहते हैं। इसकी मिट्टी में किसी न किसी रूप में हमारा सम्बन्ध बना रहता है। द्वितीय हवा, जिसमें हम साँस लेते हैं।


यह हमारे जीवन का आधार है। इसके अभाव में हम जीवन की बात नहीं सोच सकते हैं। तृतीय पानी, यह हमारे लिए हवा की भाँति आवश्यक है। यदि पानी न मिले तो प्यासे मर जायें, हवा न मिले तो दम घुटकर मर जायें। इस तरह धरती पर हमारा जीवन हवा और पानी पर निर्भर है। विज्ञान के अनुसार हवा में आक्सीजन, कार्बन डायक्साइड आदि गैसें होती हैं, तो पानी आक्सीजन और हाइड्रोजन का संयोग है। इन दोनों में इन गैसों की निश्चित मात्रा रहती है। 


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आक्सीजन हम साँस लेते हैं। यह जीवन रक्षक है। सामान्य दशा में हवा और पानी जब संयोजकों की निश्चित मात्रा से युक्त होते हैं तो शुद्ध कहलाते हैं। लेकिन जब विभिन्न कारणों से इनका अनुपात असंतुलित होता है तो ये काम के लायक नहीं रह जाते हैं और इसे ही हम प्रदूषण कहते हैं। 


ऊपर जो कुछ कहा गया है उसके आधार पर प्रदूषण तीन प्रकार के हो जाते हैं (1) वायु प्रदूषण (2) जल प्रदूषण (3) मिट्टी प्रदूषण । कल-कारखानों से निकलने वाले धुएँ, सड़े-गले पदार्थों से निकलने वाली गंध तथा ऐसे ही अन्य गैसीय पदार्थ जब वायु में मिलकर सामान्य अनुपात को विकृत कर देते हैं तो वायु साँस लेने योग्य नहीं रह जाती है। 


हमें न केवल साँस लेने में असुविधा होती है अपितु हम अनेक प्रकार की बीमारियों के कीटाणुओं को अपनी साँसों की सहायता से भीतर पहुँचा देते हैं। विज्ञान के कारण जब से पेट्रोल एवं डीजल से चलने वाली गाड़ियों का अधिकता से उपयोग होने लगा है तब से इन गाड़ियों से निकलने वाले धुएँ तथा धूलकण वायु को लगातार प्रदूषित करते जा रहे हैं। यदि कल-कारखाने स्थिर प्रदूषण घर हैं तो ये गाड़ियाँ मोबाइल प्रदूषण घर हैं। बड़े-बड़े नगरों में इनके धुएँ से वातावरण इतना प्रदूषित हो गया है कि अब चलने वाले लोग नाक पर मास्क लगाने को विवश हो गए हैं। जहाँ अधिक कल-कारखाने हैं वहाँ का आकाश हमेशा धुएँ से आच्छादित रहता है तथा उसमें काम करने वाले लोग प्रदूषित वायु में साँस लेकर अपनी आयु क्षीण करते जाते हैं। 


बढ़ती हुई आबादी के कारण अधिक मात्रा में मल-मूत्र त्याग, कल-कारखानों के कचड़े, विभिन्न रसायनों के अवशेष तथा तैलीय पदार्थ बहकर जब जल में मिल जाते हैं तो जल भी प्रदूषित हो जाता है। ऐसा जल पीने योग्य नहीं रहता है। विवशता में इसे पी लेने पर मनुष्य, पशु-पक्षी आदि या तो मर जाते हैं या बड़ी संख्या में रोगग्रस्त हो जाते हैं। 


दुनिया के वैज्ञानिकों ने विश्व भर में प्राप्त जल स्त्रोतों का परीक्षण करके यह बताया है कि जल का अधिकांश भाग प्रदूषित हो गया है और जो शुद्ध जल बचा हुआ है वह वर्तमान आबादी के लिए भी पर्याप्त नहीं है। 


एक समय था जब मिट्टी लगाने और मिट्टी से जुड़कर रहने से शरीर स्वस्थ और मजबूत होता था। लेकिन रासायनिक कचड़ों और बढ़ती हुई गंदगी के कारण मिट्टी भी प्रदूषित हो गई है। खेतों में फसल बढ़ाने या फसल की रक्षा के लिए जो खाद और कीटनाशक प्रयुक्त किये जा रहे हैं.उनसे भी मिट्टी प्रदूषित हो रही है।


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